बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे की दुर्दशा
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में एनडीए और महागठबंधन के सहयोगी दलों ने कई बार पाला बदला है, लेकिन 2020 में बने छह दलों के तीसरे गठबंधन की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है। इस ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेकुलर फ्रंट ने 243 में से 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था, मगर नतीजा निराशाजनक रहा।
सबसे अधिक 104 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का बाद में जदयू में विलय हो गया। बसपा ने 80 सीटों पर कोशिश की, पर एक ही जीत पाई और उसके विधायक भी जदयू में शामिल हो गए। एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीतीं, जिनमें से चार विधायक राजद में चले गए। अन्य दलों—समाजवादी जनता दल डेमोक्रेटिक, सहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और जनवादी पार्टी समाजवादी—का भी कोई असर नहीं रहा।
इन दलों का वोट प्रतिशत भी लगातार गिरता गया। रालोसपा को 1.77%, बसपा को 1.49% और एआईएमआईएम को 1.24% वोट मिले। बाकी दो दल नगण्य वोट पर सिमट गए। अब 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले इन दलों की राजनीतिक सक्रियता लगभग न के बराबर है, जिससे उनका भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।