नीतीश कुमार पर दांव लगाने के पीछे की सियासत: बिहार में क्यों फेल हो रहे NDA के सारे विकल्प?
पटना: बिहार में एनडीए की राजनीति पूरी तरह से नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। प्रदेश बीजेपी के सभी बड़े नेता एक सुर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ कर रहे हैं। कभी जिन्हें सत्ता से हटाने की बात कही जाती थी, अब उन्हें ‘धरोहर’ बताया जा रहा है। चाहे बात सम्राट चौधरी की हो, विजय कुमार सिन्हा की, मंगल पांडेय की या नितिन नवीन की—इन नेताओं की भाषा पूरी तरह पलट चुकी है। कभी जो नेता नीतीश पर तीखे हमले करते थे, आज वही उन्हें नेता मानने को मजबूर हैं।
बीजेपी के नेताओं की रणनीतिक चुप्पी
बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया गया है। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि “कौन मुख्यमंत्री होगा, यह समय तय करेगा”, लेकिन अब बीजेपी के प्रदेश और केंद्रीय दोनों स्तर के नेता नीतीश के नाम पर सहमति जता चुके हैं।
सवाल उठता है कि नीतीश कुमार में ऐसा क्या है जो एनडीए को किसी और विकल्प की ओर देखने से भी डर लगता है? इसका जवाब है – नीतीश कुमार की प्रशासनिक पकड़, जातिगत संतुलन, और जनता के बीच गहराई तक जमी उनकी पकड़।
जेडीयू की सीमित सीटें, फिर भी नीतीश की बादशाहत
भले ही जेडीयू के पास सिर्फ 43 सीटें हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार के पास है। जन सुराज के प्रशांत किशोर अक्सर सवाल उठाते हैं कि नीतीश कुमार को कुर्सी से कुछ ज़्यादा ही प्रेम है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बीजेपी के पास ऐसा कोई मजबूत विकल्प नहीं है, जो बिहार की सामाजिक और राजनीतिक जटिलताओं को समझता हो।
प्रदेश स्तर के नेता केवल बयानबाज़ी करते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने की शक्ति अब भी केंद्रीय नेतृत्व के पास है—और वहां से कोई नया चेहरा सामने नहीं आया है।
बीजेपी की अंदरूनी खींचतान
बीजेपी के अंदर भीषण गुटबाजी चल रही है। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश कार्यालय से लेकर संगठन तक, अलग-अलग लॉबीज़ सक्रिय हैं। प्रशांत किशोर ने हाल में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिलीप जायसवाल पर मेडिकल कॉलेज पर कब्जे का आरोप लगाकर उनकी गिरफ्तारी की मांग की, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष और बढ़ गया है। कई नेता अब जायसवाल को हटाने की रणनीति में जुटे हैं।
इसके अलावा, बीजेपी के पास कोई ऐसा जनाधार वाला चेहरा नहीं है जो नीतीश कुमार को चुनौती दे सके। इससे साफ है कि पार्टी नेतृत्व संकट से जूझ रही है।
नीतीश की सामाजिक पकड़ और जातिगत संतुलन
नीतीश कुमार आज भी दलितों, महादलितों और अति पिछड़ों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। बीजेपी की सामाजिक पैठ इन वर्गों में सीमित है। यही वजह है कि एनडीए गठबंधन में नीतीश की अहमियत और भी बढ़ जाती है। नीतीश का जातिगत समीकरण आज भी बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार है।
अगर नीतीश कुमार एनडीए से बाहर होते हैं, तो विधानसभा की कई सीटों पर बीजेपी के लिए जीत पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
नीतीश कुमार: राजनीतिक मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?
कई लोग नीतीश कुमार को ‘अवसरवादी’ नेता कहते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक क्षमता, प्रशासनिक अनुभव और बिहार की जमीनी सच्चाइयों को साधने की काबिलियत उन्हें अभी भी सबसे उपयुक्त चेहरा बनाती है। बीजेपी के पास न तो कोई तेजस्वी यादव जैसा जातीय आधार है और न ही कोई सुशील मोदी जैसा अनुभवी नेता।
तेजस्वी यादव के पास यादव-मुस्लिम वोट बैंक है, लेकिन वे नीतीश जैसी सर्वसमावेशी अपील नहीं रखते। वहीं, पिछले चुनाव में जेडीयू ने अति पिछड़ा और गैर-यादव वोटों को आरजेडी से छीन लिया था—जो नीतीश की रणनीतिक समझ का परिणाम था।
निष्कर्ष: नीतीश के बिना बीजेपी अधूरी
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का विकल्प फिलहाल किसी पार्टी के पास नहीं है। बीजेपी के पास एकमात्र विकल्प यही बचता है कि वह नीतीश के साथ मिलकर अगला चुनाव लड़े। नीतियों की आलोचना और व्यक्तिगत कटाक्ष के दौर से निकलकर अब बीजेपी पूरी तरह नीतीश कुमार के पीछे खड़ी नजर आती है।